
आरजी कॉलेज में मधुमक्खियों और शहद बनाने की प्रक्रिया पर व्याख्यान
मेरठ हीरा टाइम्स ब्यूरो। आरजी गर्ल्स कॉलेज में प्लांट कंजर्वेशन सोसाइटी, टीचर्स री-स्किलिंग सेल तथा इनोवेशन काउंसिल के तत्वाधान में 5 दिवसीय कार्यशाला एवं फैकल्टी डेवलपमेंट प्रोग्राम का तीसरा दिन रहा। मुख्य वक्ता केशव सिंघल, फाउंडर डॉक्टर आयुर्वेदा ने आल अबाउट हनी एंड बी कीपिंग टॉपिक पर व्याख्यान दिया। केशव ने मधुमक्खिया तथा उनके द्वारा शहद बनाने की प्रक्रिया को बताया। उन्होंने बताया कि मधुमक्खियों के एक छत्ते में 3 तरह की (रानी, नर और श्रमिक) मधुमक्खियां होती हैं। मधुमक्खी के छत्ते में सिर्फ एक रानी मधुमक्खी होती है, जो आकार में बाकी मधुमक्खियों से काफी बड़ी होती है । शहद बनाने का कार्य केवल श्रमिक मक्खियों द्वारा ही किया जाता है। मधुमक्खी के दो पेट होते है, जिसमें से एक पेट खाना खाने और दूसरा फूलों का रस जमा करने के लिए होता है। मधुमक्खियों द्वारा एक किलो शहद तैयार करने के लिए तकरीबन 40 लाख फूलों का रस चूसा जाता है, जिसके लिए मधुमक्खियां करीब 90 हजार मील की उड़ान भरती हैं। शहद की गुणवत्ता, मधुमक्खी की प्रजाति और एकत्रित किए गए रस की प्रजाति पर निर्भर होती है। उन्होंने बताया कि अलग-अलग प्रजाति और जलवायु के अनुसार शहद बनाने वाली मादा मधुमक्खी का जीवनकाल लगभग 21 से 60 दिन का होता है। इस तरह से तकरीबन 12 मधुमक्खियां मिलकर अपने पूरे जीवनकाल में 1 चम्मच शहद तैयार करती हैं। मधुमक्खी से बनने वाले प्रोडक्ट्स जैसे बी पॉलेन, बी वेनॉम, बी वैक्स, रॉयल जेली और शहद के बारे में विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने मधुमक्खियां के रखरखाव तथा शहद की प्योरिटी जांचने वाले टेस्ट जैसे थंब टेस्ट, पेपर टेस्ट, हनीकॉन्ब इफेक्ट इन वॉटर टेस्ट एंड स्पून ड्रॉप इन ग्लास टेस्ट के बारे में भी जानकारी साझा की । प्राचार्य प्रो. निवेदिता कुमारी ने कहा कि मधुमक्खियां हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह शहद देने के साथ ही पूरी दुनिया को जीवित रखने का भी काम करती हैं। उन्होंने छात्राओं को मधुमक्खी पालन व्यवसाय से जुड़ने के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने बताया की मधुमक्खी पालन एक पर्यावरण कल्याणकारी (ईकोफ्रेन्डली) उद्योग के रूप उभर कर सामने आया है। मधुमक्खी पालन व्यवसाय से हम खुद के साथ-साथ व्यावसायिक प्रयोग के लिए उच्च गुणवत्ता वाले शहद का उत्पादन कर मुनाफा कमा सकते हैं। मधुमक्खी पालन व्यवसाय न केवल ग्रामीण क्षेत्रों में मुख्य उद्योगों को बढ़ावा देने में एक अहम प्रभावशाली भूमिका निभा सकता है, बल्कि विदेशों में भारतीय शहद की दिन प्रतिदिन बढ़ती हुई मांग को देखते हुए विदेशी मुद्रा अर्जित करने में एक महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है । र्कशॉप कोऑर्डिनेटर डॉ. गरिमा मालिक ने बताया कि मधुमक्खी पालन व्यापार के लिए भारत सरकार का एमएसएमई विभाग आर्थिक मदद करता है। इस मंत्रालय के खादी एंड विलेज इंडस्ट्री कमीशन के तहत कई योजनाएं चलती हैं, जिनके अंतर्गत मधुमक्खी पालन व्यवसाय को प्रोत्साहित किया जाता है। इस व्यवसाय के आरम्भ के लिए सरकार हनी प्रोसेसिंग प्लांट की स्थापना के लिए कुल लागत का 65ः हिस्सा ऋण के तौर पर देती है। इस ऋण के अलावा सरकार की तरफ से 25ः की सब्सिडी भी प्राप्त होती है। इनका रहा योगदान: कार्यक्रम की आयोजिका डॉ. अनुपमा सिंह, असिस्टेंट प्रोफेसर वनस्पति विज्ञान विभाग, तथा सह-आयोजिका संयोगिता कुमारी रही। कार्यशाला में प्रदेश के विभिन्न कॉलेजों से 60 प्रतिभागियों ने प्रतिभागिता की। कार्यक्रम को सफल बनाने में डॉ. मधु मलिक, डॉ. गीता सिंह, निर्लिप कौर, प्रो. अमिता शर्मा, मीडिया प्रभारी
प्रो. सुनीता, डॉ. पूनम लता सिंह, अनामिका आदि का सहयोग रहा।