मेरठ। रघुनाथ गर्ल्स पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज की प्लांट कंजर्वेशन सोसायटी के द्वारा प्राचार्या प्रोफेसर निवेदिता मलिक के निर्देशन में अतिथि व्याख्यान का आयोजन किया गया । इस कार्यक्रम में संजय गांधी पीजी कॉलेज के वनस्पति विज्ञान विभाग के सहायक प्रोफेसर डाक्टर प्रभात सिंह मुख्य वक्ता रहे। उन्होंने बौद्धिक संपदा अधिकार और पादप आनुवंशिक संसाधन” विषय पर अपना व्याख्यान प्रस्तुत किया । कार्यक्रम का शुभारंभ करते हुए महाविद्यालय की प्राचार्या निवेदिता मलिक ने कहा कि बौद्धिक संपदा अधिकार मानव मस्तिष्क की उपज है । साहित्य, संगीत, चित्रकला, खोज, अविष्कार आदि के क्षेत्रों में किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह द्वारा जो कुछ सृजन किया जाता है उसे बौद्धिक संपदा अधिकार की श्रेणी में रखा जाता हैं । अपने व्याख्यान में डॉ प्रभात सिंह ने बताया कि बौद्धिक संपदा अधिकार का मुख्य उद्देश्य सृजनकर्ताओं और आविष्कारकों को उनकी बौद्धिक रचनाओं को कानूनी रूप से संरक्षित करना है। यह उन्हें अपने काम का उपयोग करने और उससे लाभ उठाने का विशेष अधिकार देता है । पादप आनुवंशिक संसाधन पौधों की विविधता और भविष्य के लिए खाद्य सुरक्षा को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण हैं। वे नए और बेहतर किस्मों के विकास के लिए आधार प्रदान करते हैं । बौद्धिक संपदा अधिकार का विस्तार, विशेष रूप से पादप आनुवंशिक संसाधन पर, कृषि अनुसंधान के लिए पौधों की आनुवंशिक सामग्रियों के मुक्त आदान-प्रदान की प्रणाली को बाधित कर सकता है, जिससे विकासशील देशों में कृषि उत्पादकता में प्रगति प्रभावित हो सकती है । डॉ प्रभात सिंह ने पादप आनुवंशिक संसाधन और बौद्धिक संपदा अधिकार के बीच संतुलन स्थापित करने पर जोर दिया ।उन्होंने कहा कि बौद्धिक संपदा अधिकार का उपयोग नए और बेहतर किस्मों के विकास को प्रोत्साहित करने के लिए किया जा सकता है, लेकिन यह सुनिश्चित करना भी आवश्यक है कि बौद्धिक संपदा अधिकार, पादप आनुवंशिक संसाधन के मुक्त आदान-प्रदान को बाधित न करें और स्थानीय समुदायों और किसानों के अधिकारों की रक्षा करें । कार्यक्रम के अंत में मुख्य वक्ता डॉक्टर प्रभात सिंह को प्लांट कंजर्वेशन सोसायटी की तरफ से औषधीय पौधे भेंट किए गए। इस कार्यक्रम की कन्वीनर वनस्पति विज्ञान विभाग पीजी कोऑर्डिनेटर डॉक्टर गरिमा मलिक रहीं और औरगेनाइजिंग सेक्रेटरी डॉक्टर अनुपमा सिंह रहीं। इस कार्यक्रम को सफल बनाने में प्लांट कंजर्वेशन सोसायटी की सभी सदस्यों का सक्रिय योगदान रहा।
