
नई दिल्ली एजेंसी। भारत का जब भी आर्थिक इतिहास लिखा जाएगा, तब उसमें 24 जुलाई, 1991 की तारीख का खास तौर पर उल्लेख किया जाएगा। यहीं वह दिन था जब पीवी नरसिंह राव के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार के वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने अपना पहला बजट पेश किया था। इस बजट ने न सिर्फ भारतीय इकोनमी को लाइसेंस राज के जाल से मुक्त कराने का रास्ता साफ किया बल्कि आतंकवाद, महंगाई, राजनीतिक अस्थिरता और आर्थिक अनिश्चतता के माहौल में फंसे भारतीय जनमानस के लिए उम्मीद की एक नई किरण जगाई। भारत को तेज आर्थिक विकास दर की राह पर डाला आयात के लिए लाइसेंस को खत्म करना, अधिकांश उद्योगों के लिए कई तरह के लाइसेंस लेने की बाध्यता को खत्म करना, कई सेक्टरों को विदेशी निवेश के लिए खोलना और रणनीतिक क्षेत्रों में विदेशी कंपनियों को निवेश करने का संकेत देना, पूंजी बाजार पर सरकार के सीधे नियंत्रण को खत्म करना, ब्याज दरों को तर्कसंगत बनाना, रुपये का अवमूल्यन कर निर्यात पर जोर देना जैसी दर्जनों घोषणाएं थीं जिसने भारत को तेज आर्थिक विकास दर की राह पर डाला। वित्त मंत्री के तौर पर डा. सिंह का कार्यकल वर्ष 1991-1996 तक रहा और आज उस अवधि को देखने पर निश्चित तौर पर यह लगता है कि आर्थिक सुधारों की शुरुआत करने के बावजूद बाद के वर्षों में सुधारों से सरकार भटकी भी। खासतौर पर मुंबई शेयर बाजार में बड़े घोटाले का पर्दाफाश होने के बाद कई क्षेत्रों में अपेक्षित कदम नहीं उठाए जा सके।प्रधानमंत्री कार्यालय पर ही भ्रष्टाचार के आरोप लगे प्रधानमंत्री कार्यालय पर ही भ्रष्टाचार के आरोप लगने के बाद राजनीतिक अस्थिरता की वजह से भी सरकार का फोकस आर्थिक नीतियों से हट गया। देश में आंतरिक स्तर पर जिस तरह से सुधारों की दरकार थी, वो नहीं किए जा सके। यह वह दौर था, जब अमेरिका व यूरोप की दिग्गज मैन्यूफैक्चोरग कंपनियों ने चीन में निवेश की शुरुआत शुरू कर दी थी। उसी निवेश से चीन आज दुनिया के सप्लाई चेन का प्रमुख धुरी बन बैठा है। लोकतंत्र, अंग्रेजी बोलने वाला कुशल श्रम और बाजार होने के बावजूद भारत सरकार की तरफ से बड़ी-बड़ी वैश्विक कंपनियों को यहां निवेश के लिए आकर्षित नहीं किया जा सका। लाइसेंस राज खत्म करने का आह्वान करने के बावजूद तत्कालीन सरकार ब्यूरोक्रेसी के अड़चनों को खत्म नहीं कर सकी। भारत को एक समग्र आर्थिक शक्ति के तौर पर पेश करने के लिए केंद्र व राज्यों के बीच जिस तरह के सामंजस्य की जरूरत थी, वह भी नहीं किया जा सका।आर्थिक विकास दर 7.5 प्रतिशत को छूने की रखी थी नींव 2004-2005 में जब भारत की आर्थिक विकास दर 7.5 प्रतिशत को छू गई तो कहा गया कि आजादी के बाद हिंदू ग्रोथ रेट के चक्र से भारत अब बाहर निकल चुका है। यह सिर्फ उन सुधारों की वजह से हुआ जिसकी नींव 1991 में डॉ. सिंह ने रखी थी। यह भारतीय राजनीति की एक बड़ी विडंबना है कि जिन सुधारों की शुरुआत डा. सिंह ने बतौर वित्तमंत्री की थी, प्रधानमंत्री बनने के बाद उन सुधारों को आगे बढ़ाने की बजाय उससे समझौता करते नजर आये। वैश्विक बैंकिंग संकट में भी भारतीय अर्थव्यवस्था बची रही 2004 में जब वामपंथी दलों के समर्थन से यूपीए-एक की सरकार बनी और डा. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने, उम्मीद थी कि आर्थिक सुधारों का नया दौर शुरू होगा। ऐसा नहीं हो सका। इसके बावजूद जब 2007 के वैश्विक बैंोकग संकट ने कई विकसित देशों की हालत खस्ता कर दी तब भारतीय इकोनमी को साफ बचा लिया गया। घरेलू मांग को बढ़ाने के लिए उत्पाद शुल्क में कटौती को अभी भी मास्टर स्ट्रोक माना जाता है। बतौर पीएम डॉ. सिंह ने ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजन के लिए मनरेगा लागू करने में अहम भूमिका निभाई। बाद में भाजपा सरकार ने इसकी आलोचना तो बहुत की लेकिन इसे और तेजी से लागू करने में कोई कोताही नहीं की। भारत की साख न्यूनतम स्तर पर थी आज भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी इकोनमी है और अगले दो-तीन वर्षों इसके पांच ट्रिलियन डालर की इकोनमी बनना तय है। लेकिन, जब डॉ. सिंह ने अपना पहला बजट पेश किया था तब देश के पास महज तीन हफ्तों का विदेशी भंडार बचा हुआ था। वैश्विक बाजार में भारत की साख न्यूनतम स्तर पर थी। देश के पास विश्व बैंक व आइएमएफ से भारी-भरकम कर्ज लेने के अलावा कोई चारा नहीं था। लेकिन बजटीय भाषण में उन्होंने कहा था, कोई भी शक्ति उस विचार को नहीं रोक सकती जिसका समय आ गया हो। मैं इस सदन को बताना चाहूंगा कि एक बड़ी आर्थिक शक्ति के विचार का भी समय आ गया है। उस बजट ने मूल तौर पर आर्थिक सुधारों की जो प्रक्रिया शुरू की वह कई मायने में भारतीय राजनीति के लिए दशकों तक अछूते विषय थे। आर्थिक नीतियों के दूरगामी असर हुए साल दर साल भारत की आर्थिक शक्ति बढ़ीबतौर वित्त मंत्री डा. मनमोहन सिंह ने जिन आर्थिक नीतियों को लागू किया उसके दूरगामी असर हुए। कई बार वैश्विक अनिश्चितता के बीच भारत दोबारा भुगतान संकट के दलदल में नहीं फंसा। साल दर साल भारत की आर्थिक शक्ति बढ़ी है। वित्त मंत्री सिंह के अधूरे एजेंडे को वर्ष 1999 की वाजपेयी सरकार के वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने तेजी से आगे बढ़ाया। बैंोकग व बीमा सेक्टर में सुधार व विदेशी कंपनियों को प्रवेश की आजादी जैसे ऐसे कदम थे जिसका आइडिया डॉ. सिंह ने दिया था।