
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाई कोर्ट बेंच की मांग कोई नई नहीं है, बल्कि यह संघर्ष पिछले सात दशकों से लगातार चला आ रहा है। क्षेत्र के अधिवक्ता और नागरिक लंबे समय से सुलभ, सस्ते और त्वरित न्याय के लिए यहां हाई कोर्ट बेंच की स्थापना की मांग करते आ रहे हैं। पश्चिम यूपी से जुड़े हजारों मुकदमे इलाहाबाद हाई कोर्ट में लंबित हैं, जहां तक पहुंचने में आम लोगों को लंबी दूरी, अतिरिक्त समय और भारी खर्च का सामना करना पड़ता है।
बुधवार को भी इसी मांग को लेकर केंद्रीय संघर्ष समिति के आह्वान पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ऐतिहासिक बंद देखा गया। मेरठ में करीब 1200 संगठनों ने बंद का समर्थन किया। पश्चिम यूपी के 22 जनपदों में से 20 जिलों में अधिवक्ताओं ने पूर्ण कार्य बहिष्कार कर बंद को सफल बनाया, जबकि शामली और बिजनौर में वकीलों ने कामकाज से दूरी बनाए रखी।
केंद्रीय संघर्ष समिति के चेयरमैन संजय शर्मा के अनुसार, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाई कोर्ट बेंच की मांग पहली बार वर्ष 1951 में तत्कालीन मुख्यमंत्री संपूर्णानंद ने उठाई थी। इसके बाद अलग-अलग समय पर नारायण दत्त तिवारी, रामनरेश यादव, बाबू बनारसी दास और मायावती जैसे कई मुख्यमंत्रियों ने भी इस मांग की आवश्यकता स्वीकार की, लेकिन आज तक इसे अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका।
यदि आंदोलन के इतिहास पर नजर डालें तो वर्ष 1981 में हाई कोर्ट बेंच स्थापना के लिए केंद्रीय संघर्ष समिति का गठन किया गया। उसी वर्ष समिति ने मसूरी से दिल्ली तक पैदल मार्च कर सरकार का ध्यान आकर्षित किया। 1983 में जसवंत सिंह आयोग का गठन हुआ, जिसके बाद आंदोलन और तेज हुआ। वर्ष 1987 में अधिवक्ताओं ने जेल भरो आंदोलन चलाया।
इसके बाद 2001 में वकीलों ने करीब छह महीने तक कामकाज ठप रखा। 2009 में एक बार फिर लंबे समय तक न्यायिक कार्य प्रभावित रहा। वर्ष 2015 में लगभग तीन महीने तक अधिवक्ताओं ने न्यायिक कार्य से दूरी बनाई। इसके बाद भी अलग-अलग चरणों में आंदोलन लगातार जारी रहा है।
लगातार आंदोलनों, राजनीतिक सहमतियों और जनसमर्थन के बावजूद पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाई कोर्ट बेंच की स्थापना अब तक नहीं हो सकी है। क्षेत्र के अधिवक्ताओं और आम लोगों का कहना है कि जब देश के कई राज्यों और क्षेत्रों में एक से अधिक हाई कोर्ट बेंच स्थापित की जा सकती हैं, तो पश्चिम यूपी जैसे बड़े और आबादी वाले क्षेत्र को यह सुविधा क्यों नहीं मिल पा रही है।
