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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। नासा के अत्याधुनिक जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप (JWST) ने ब्रह्मांड के शुरुआती दौर से जुड़ी एक बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धि हासिल की है। वैज्ञानिकों का दावा है कि उन्हें बिग बैंग के तुरंत बाद बने सबसे शुरुआती तारों के संकेत मिले हैं, जिन्हें खगोल विज्ञान की भाषा में पॉपुलेशन-III (Pop-III) तारे कहा जाता है।
हाल ही में प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका द एस्ट्रोफिजिकल जर्नल लेटर्स में प्रकाशित शोध के अनुसार, ये प्राचीन तारे पृथ्वी से लगभग 13 अरब प्रकाश-वर्ष दूर स्थित LAP1-B नामक गैलेक्सी में पाए गए हैं। यह गैलेक्सी उस समय की मानी जा रही है, जब ब्रह्मांड अभी अपने प्रारंभिक विकास चरण में था।
इस अध्ययन का नेतृत्व खगोलशास्त्री एली विस्बाल ने किया। उनकी टीम ने JWST के इंफ्रारेड स्पेक्ट्रम के विश्लेषण के आधार पर बताया कि इन तारों से अत्यधिक तीव्र अल्ट्रावायलेट विकिरण निकला है। वैज्ञानिकों के अनुसार, इन तारों का द्रव्यमान सूर्य से करीब 100 गुना अधिक हो सकता है। शोध में यह भी सामने आया कि LAP1-B गैलेक्सी उन सभी सैद्धांतिक शर्तों पर खरी उतरती है, जो Pop-III तारों के निर्माण के लिए आवश्यक मानी जाती हैं।
वैज्ञानिकों के मुताबिक, ये तारे अत्यंत कम धात्विक तत्वों वाले वातावरण में बने, जहां मुख्य रूप से हाइड्रोजन और हीलियम मौजूद थे। इनका निर्माण छोटे समूहों में हुआ, जिनमें कुछ ही लेकिन बेहद विशाल तारे शामिल थे। इसके अलावा, यह समूह शुरुआती द्रव्यमान वितरण से जुड़ी गणितीय शर्तों को भी पूरा करता है।
Space.com से बातचीत में एली विस्बाल ने कहा कि यदि यह पुष्टि हो जाती है कि ये वास्तव में Pop-III तारे हैं, तो यह ब्रह्मांड के सबसे शुरुआती तारों की पहली प्रत्यक्ष खोज होगी। उन्होंने बताया कि इस खोज के लिए JWST की असाधारण संवेदनशीलता के साथ-साथ हमारे और LAP1-B के बीच मौजूद एक गैलेक्सी क्लस्टर द्वारा उत्पन्न ग्रेविटेशनल लेंसिंग का सहारा लेना पड़ा, जिससे इन तारों की छवि लगभग 100 गुना तक स्पष्ट हो सकी।
ब्रह्मांड की संरचना को समझने में मददगार
वैज्ञानिकों का मानना है कि ये प्राचीन तारे आगे चलकर बड़ी गैलेक्सियों के निर्माण की नींव बने होंगे। इनके अध्ययन से ब्रह्मांड के शुरुआती कॉस्मिक सिस्टम की संरचना और विकास को समझने में अहम जानकारी मिल सकती है। प्रचलित सिद्धांतों के अनुसार, शुरुआती दौर में हाइड्रोजन और हीलियम डार्क मैटर के प्रभाव में आकर ऐसे विशाल तारों में बदले, जिनकी चमक सूर्य से अरबों गुना अधिक थी।
एली विस्बाल ने आगे बताया कि अगला चरण Pop-III से Pop-II यानी ब्रह्मांड की दूसरी पीढ़ी के तारों में हुए बदलाव का विस्तृत अध्ययन करना होगा। इसके लिए उन्नत हाइड्रोडायनामिकल सिमुलेशन किए जाएंगे, ताकि यह समझा जा सके कि LAP1-B जैसी गैलेक्सियों के स्पेक्ट्रम से ये मॉडल कितनी सटीकता से मेल खाते हैं।
शोधकर्ताओं का यह भी कहना है कि ग्रेविटेशनल लेंसिंग की मदद से Pop-III तारों पर की गई यह स्टडी शायद अभी सिर्फ शुरुआत है और आने वाले समय में ब्रह्मांड के और भी रहस्यों से पर्दा उठ सकता है।
