प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 5 जून 2024 को विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर एक नई पहल की शुरुआत की एक पेड़ मां के नाम और इसका उद्देश्य केवल पर्यावरण संरक्षण ही नहीं बल्कि समाज को एक भावनात्मक धागे में पिरोना भी था। मां के नाम पर एक पौधा लगाना, लोगों को भावनात्मक रूप से जोड़ने का सशक्त माध्यम बन सकता है। इस अभियान के तहत सितंबर 2024 तक 80 करोड़ पौधे और मार्च 2025 तक 140 करोड़ पौधे लगाने का लक्ष्य रखा गया है। यह अपने आप में एक बहुत ही महत्वाकांक्षी और प्रशंसनीय योजना है। लेकिन जैसे हर बार होता आया है, सवाल फिर वही उठता है क्या यह अभियान केवल फोटो खिंचाने और दिखावे तक सिमट कर रह जाएगा? द प्रबंधन और देखभाल का अभाव: पौधा लगाने से ज्यादा महत्वपूर्ण होता है उसकी देखभाल दृ नियमित पानी, खाद, सुरक्षात्मक घेरा, धूप-छांव का ध्यान आदि। लेकिन दुर्भाग्यवश हमारी योजनाओं में इस पहलू को गंभीरता से नहीं लिया जाता। अधिकांश पौधे शुरुआती कुछ हफ्तों में ही मर जाते हैं।
द सामाजिक सहभागिता की कमी पौधारोपण सरकारी योजना बनकर रह जाता है। इसमें आमजन की भागीदारी बहुत सीमित होती है। यदि कोई आम व्यक्ति हिस्सा लेना भी चाहे तो उसके पास कोई सुव्यवस्थित मंच या सहयोग उपलब्ध नहीं होता।
द क्या पौधारोपण महज इवेंट बनकर रह गया है? आज के डिजिटल युग में हर कार्य सोशल मीडिया फ्रेंडली बन चुका है।
पौधारोपण भी इसका अपवाद नहीं है। जैसे ही कोई अभियान घोषित होता है, स्थानीय अधिकारी, राजनेता और संस्थाएँ इसे एक पीआर अवसर के रूप में देखती हैं। पौधा लगाते हुए कैमरे की ओर देखकर पोज देना, उसके बाद तुरंत इंस्टाग्राम, फेसबुक और ट्विटर पर अपलोड करना जैसे इस अभियान का मुख्य उद्देश्य बन गया है। ग्रीन सेल्फी संस्कृति आज ‘ग्रीन सेल्फी’ और ‘प्लांटिंग वीडियो’ एक ट्रेंड बन चुका है, जिसमें पौधे की वास्तविक स्थिति या प्रभाव से ज्यादा फोकस इस पर होता है कि तस्वीर कितनी ‘वायरल’ हो सकती है।
