
नई दिल्ली। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया लगातार दबाव में बना हुआ है और सोमवार को यह अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया। समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक, अमेरिका और भारत के बीच व्यापार वार्ताओं में जारी गतिरोध, घरेलू शेयर और बॉन्ड बाजार से विदेशी निवेशकों की निरंतर निकासी के कारण रुपये पर भारी दबाव देखने को मिला।
सोमवार को भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले करीब 0.2 प्रतिशत टूटकर 90.64 के स्तर पर पहुंच गया। इसके साथ ही रुपये ने 12 दिसंबर को बने अपने पिछले सर्वकालिक निचले स्तर 90.55 को भी पार कर लिया। बाजार जानकारों का कहना है कि मौजूदा हालात में रुपये की कमजोरी फिलहाल थमने के संकेत नहीं दे रही है।
रुपये का एशियाई बाजारों में प्रदर्शन भी बेहद कमजोर रहा है। रॉयटर्स से बातचीत में चार करेंसी ट्रेडर्स ने बताया कि इस वर्ष एशिया की प्रमुख मुद्राओं में भारतीय रुपया सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली करेंसी में शामिल है। हालांकि, केंद्रीय बैंक के संभावित हस्तक्षेप की उम्मीद के चलते रुपये में बड़ी गिरावट कुछ हद तक थमी हुई है।
इस साल अब तक डॉलर के मुकाबले रुपये में करीब 5.5 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की जा चुकी है। इसकी बड़ी वजह अमेरिका द्वारा भारतीय उत्पादों पर 50 प्रतिशत तक के ऊंचे टैरिफ लगाए जाना है, जिससे भारत के सबसे बड़े निर्यात बाजार में निर्यात पर असर पड़ा है। इसके अलावा, विदेशी निवेशकों के लिए भारतीय शेयर बाजार का आकर्षण भी कम हुआ है।
विदेशी निवेशकों की बिकवाली ने रुपये पर दबाव और बढ़ा दिया है। आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025 में अब तक विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से 18 अरब डॉलर से अधिक की निकासी की है, जिससे भारत पोर्टफोलियो आउटफ्लो के लिहाज से सबसे ज्यादा प्रभावित बाजारों में शामिल हो गया है। इसके साथ ही दिसंबर महीने में विदेशी निवेशकों ने 500 मिलियन डॉलर से ज्यादा के बॉन्ड भी बेच दिए हैं।
आर्थिक मोर्चे पर नजर डालें तो नवंबर महीने के भारत के व्यापार घाटे से जुड़े आंकड़े भी आज जारी होने की संभावना है। अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि अक्टूबर में दर्ज 41 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर से घटकर नवंबर में व्यापार घाटा करीब 32 अरब डॉलर रह सकता है।
मुंबई स्थित एक बैंक के करेंसी ट्रेडर ने बताया कि भारत के मुख्य आर्थिक सलाहकार की यह टिप्पणी कि अमेरिका के साथ व्यापार समझौता मार्च से पहले संभव नहीं है, बाजार की धारणा को और कमजोर कर गई है। इसी वजह से विदेशी पूंजी का बाहर जाना लगातार बना हुआ है।
इस बीच, ब्लूमबर्ग न्यूज की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत और यूरोपीय संघ के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौते को भी इस साल के अंत तक अंतिम रूप दिए जाने की संभावना कम है। इन घटनाक्रमों से वैश्विक व्यापार को लेकर नकारात्मक माहौल बना हुआ है, जिसका सीधा असर रुपये पर पड़ रहा है।
दिलचस्प बात यह है कि वैश्विक स्तर पर डॉलर में कमजोरी के बावजूद भारतीय रुपया इसका फायदा नहीं उठा पा रहा है। डॉलर इंडेक्स इस महीने अब तक करीब 1.1 प्रतिशत नीचे आ चुका है, लेकिन व्यापार और पूंजी प्रवाह को लेकर बने नकारात्मक माहौल के चलते रुपये में सुधार नहीं दिख रहा है।
फॉरेक्स एडवाइजरी फर्म आईएफए ग्लोबल का कहना है कि मध्यम अवधि में भी रुपये का प्रदर्शन कमजोर बना रह सकता है। फर्म के अनुसार, अगले छह हफ्तों में डॉलर के मुकाबले रुपये की चाल 89.60 से 90.60 के दायरे में रह सकती है।
