
मेरठ की पारंपरिक गजक और रेवड़ी ने वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान और मजबूत कर ली है। 121 वर्षों से चली आ रही इस विशिष्ट मिठाई को अब जियोग्राफिक इंडिकेशन (GI) टैग प्राप्त हो गया है। यह उपलब्धि न सिर्फ मेरठ के लिए गर्व की बात है, बल्कि इससे जुड़े हजारों कारीगरों और कारोबारियों के लिए भी नई संभावनाओं के द्वार खोलने वाली है।
मेरठ रेवड़ी गजक व्यापारी वेलफेयर एसोसिएशन की ओर से चेन्नई स्थित जीआई रजिस्ट्री में इसके लिए आवेदन किया गया था। जीआई टैग मिलने के बाद गजक उद्योग से जुड़े लोगों में उत्साह है। एसोसिएशन के अध्यक्ष वरुण गुप्ता के अनुसार, इस कारोबार से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से 10 हजार से अधिक लोगों की आजीविका जुड़ी हुई है। उन्होंने बताया कि जीआई टैग से मेरठ की गजक को अंतरराष्ट्रीय बाजार में अलग पहचान मिलेगी और व्यापार में बढ़ोतरी होगी।
इस सफलता में ‘जीआई मैन’ के नाम से पहचाने जाने वाले डॉ. रजनीकांत का भी अहम योगदान रहा। एसोसिएशन के महामंत्री और बंगाल स्वीट हाउस के संचालक समीर थापर का कहना है कि जीआई टैग के बाद जब भी विश्व में गजक या रेवड़ी की खोज होगी, उसमें मेरठ का नाम प्रमुखता से सामने आएगा। इससे स्थानीय निर्माताओं की पहुंच सीधे वैश्विक बाजार तक बनेगी।
मेरठ में रेवड़ी और गजक का यह मौसमी कारोबार लगभग चार से पांच महीने चलता है, जिसका वार्षिक टर्नओवर 50 से 60 करोड़ रुपये के आसपास है। शहर में करीब 35 फर्में गजक और रेवड़ी के निर्माण से जुड़ी हैं, जो देश के विभिन्न हिस्सों के साथ-साथ विदेशों में भी अपने उत्पाद भेजती हैं।
गजक की यह परंपरा वर्ष 1904 से जुड़ी मानी जाती है। बताया जाता है कि गुदड़ी बाजार में लाला रामचंद्र की दुकान पर तिल और गुड़ से प्रयोग के दौरान संयोगवश रेवड़ी जैसी मिठाई तैयार हुई, जिसे लोगों ने खूब पसंद किया। लगातार सुधार और प्रयोग के बाद 1915 तक मेरठ की रेवड़ी अपने मौजूदा स्वरूप में सामने आ गई। ब्रिटिश दौर में भी अंग्रेज अधिकारी इसके स्वाद के प्रशंसक थे। आज भी रामचंद्र नाम से गजक-रेवड़ी बनाने वाली कई दुकानें शहर में मौजूद हैं।
ठंड के मौसम में गजक और रेवड़ी को केवल मिठाई नहीं, बल्कि स्वास्थ्यवर्धक खाद्य पदार्थ के रूप में भी देखा जाता है। तिल और गुड़ से बनी इस मिठाई में लौंग, इलायची, जावित्री और जायफल जैसे मसाले मिलाए जाते हैं, जो सर्दियों में शरीर के लिए लाभकारी माने जाते हैं। नवरात्र से लेकर फरवरी की शुरुआत तक इसकी मांग चरम पर रहती है।
समय के साथ मेरठ की गजक ने भी नए-नए रूप अपनाए हैं। पारंपरिक गुड़ की रेवड़ी और काजू वाली गजक के अलावा अब पट्टी गजक, स्प्रिंग रोल गजक, चॉकलेट रोल गजक और ड्राई फ्रूट समोसा गजक जैसी वैरायटी भी बाजार में उपलब्ध हैं। कारोबारियों के अनुसार, मेरठ की गजक और रेवड़ी आज करीब 18 देशों तक निर्यात की जा रही है।
गौरतलब है कि जीआई टैग किसी विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र से जुड़े उत्पाद को उसकी गुणवत्ता और पहचान के आधार पर दिया जाता है। इससे नकली उत्पादों पर रोक लगती है और असली उत्पाद को बेहतर मूल्य व अंतरराष्ट्रीय पहचान मिलती है। मेरठ की गजक को मिला यह टैग आने वाले समय में स्थानीय उद्योग के लिए मील का पत्थर साबित होने की उम्मीद है।
