
गाजियाबाद। लोनी क्षेत्र में नकली दवाएं बनाने वाली फैक्ट्री के पकड़े जाने के बाद एक बार फिर गाजियाबाद के औषधि विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। दिल्ली पुलिस की छापामारी से यह स्पष्ट हो गया है कि जिले में ड्रग माफिया का नेटवर्क गहराई तक फैला हुआ है, लेकिन उसे तोड़ने में जिले में तैनात दोनों औषधि निरीक्षक अब तक प्रभावी कार्रवाई करने में असफल साबित हुए हैं।
सूत्रों के अनुसार, जिले में नकली दवाओं के निर्माण और अवैध सप्लाई का कारोबार लंबे समय से फल-फूल रहा है। इसके बावजूद औषधि विभाग की ओर से न तो समय रहते ठोस कार्रवाई हो पाई और न ही नेटवर्क की जड़ों तक पहुंच बनाई जा सकी। विभाग की इस विफलता के पीछे संसाधनों की कमी और मजबूत खुफिया तंत्र का अभाव प्रमुख कारण माना जा रहा है।
स्थिति यह है कि जिले में दवाओं की अवैध सप्लाई या नकली दवाओं के मामलों का खुलासा अक्सर स्थानीय ड्रग विभाग नहीं, बल्कि दूसरे जिलों या राज्यों की पुलिस और एजेंसियों की कार्रवाई के बाद होता है। हाल ही में लोनी में पकड़ी गई नकली दवाओं की फैक्ट्री इसका ताजा उदाहरण है, जिसका भंडाफोड़ दिल्ली पुलिस की टीम ने किया।
इससे पहले तीन नवंबर को मेरठ रोड स्थित मछली गोदाम क्षेत्र में क्राइम ब्रांच और ड्रग विभाग की संयुक्त टीम ने कफ सीरप की बड़ी खेप पकड़ी थी, जिसकी अनुमानित कीमत करीब साढ़े तीन करोड़ रुपये बताई गई थी। यह कार्रवाई भी सोनभद्र पुलिस से मिले इनपुट के आधार पर की गई थी। इससे यह साफ होता है कि स्थानीय स्तर पर ड्रग माफिया की गतिविधियों पर नजर रखने और समय रहते कार्रवाई करने में विभाग नाकाम रहा है।
लोनी क्षेत्र पहले भी नकली दवाओं के निर्माण और अवैध गतिविधियों का हॉटस्पॉट रहा है। यहां पूर्व में भी इस तरह के कई मामले सामने आ चुके हैं। इसके बावजूद ड्रग विभाग अब तक इस अवैध नेटवर्क को पूरी तरह से ध्वस्त करने में सफल नहीं हो सका है, जिससे विभाग की सतर्कता और निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं।
गाजियाबाद जिले में पांच हजार से अधिक मेडिकल स्टोर संचालित हो रहे हैं। दवाओं की थोक बिक्री मुख्य रूप से नई बस्ती स्थित दवा मार्केट से होती है। इसके अलावा मोहन नगर, मेरठ रोड औद्योगिक क्षेत्र सहित कई अन्य इलाकों में नामी दवा कंपनियों के डिस्ट्रीब्यूटर भी सक्रिय हैं। जिले में 500 से अधिक थोक दवा विक्रेता बताए जाते हैं, जिनके माध्यम से दवाओं की बड़ी सप्लाई होती है।
जानकारों का कहना है कि जब भी प्रदेश स्तर से दवाओं की जांच का अभियान चलाने के निर्देश मिलते हैं, तब औषधि निरीक्षक लाइसेंसधारी मेडिकल स्टोर और थोक विक्रेताओं के यहां औपचारिक जांच तक ही सीमित रह जाते हैं। जबकि नकली दवाओं के निर्माण, अवैध बिक्री और गैरकानूनी सप्लाई में लिप्त लोगों तक विभाग की पहुंच नहीं बन पाती।
इस पूरे मामले में ड्रग इंस्पेक्टर आशुतोष मिश्रा से उनका पक्ष जानने के लिए फोन पर संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो सका। वहीं, जिले में लगातार सामने आ रहे नकली दवाओं के मामलों के बाद आम लोगों और स्वास्थ्य से जुड़े विशेषज्ञों में चिंता बढ़ती जा रही है। उनका कहना है कि यदि समय रहते सख्त और प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई, तो यह नेटवर्क जनस्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा बन सकता है।
