एक ऐतिहासिक क्षण या कूटनीतिक भूल? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा अमेरिका में किसी अन्य देश के राष्ट्राध्यक्ष का इस प्रकार प्रचार करना न केवल अभूतपूर्व था, बल्कि भारत की कूटनीतिक परंपराओं से कुछ हद तक भिन्न भी था। भारत हमेशा से “गुटनिरपेक्ष” नीति का पक्षधर रहा है, और किसी एक नेता के पक्ष में इस प्रकार खुलकर खड़ा होना कई विशेषज्ञों को असहज कर गया था। उस समय यह दिखाने की कोशिश की गई कि अमेरिका और भारत के रिश्ते स्वर्ण युग में प्रवेश कर चुके हैं। लेकिन शायद उस समय यह विचार नहीं किया गया कि अमेरिकी राजनीति कितनी अस्थिर और व्यक्तिनिष्ठ हो सकती है। अमेरिका में हर चार साल में राजनीतिक समीकरण बदल जाते हैं, और वहां की नीतियां व्यक्ति-आधारित अधिक और संस्थान-आधारित कम होती हैं। अमेरिका का बदलता रवैया और ‘दोस्ती’ की सच्चाई डोनाल्ड ट्रंप ने जब से भारत के खिलाफ टैरिफ (सीमा शुल्क) लगाए और ट्रेड रेगुलेशन के तहत भारत पर आर्थिक दबाव बनाना शुरू किया, तब से स्पष्ट हो गया कि ‘मित्रता’ केवल मंच तक सीमित थी। 2020 में जब ट्रंप प्रशासन ने भारत को ‘जनरलाइज्ड सिस्टम ऑफ प्रेफरेंसेज’ (ळैच्) से बाहर किया, तो भारत को 5.6 बिलियन डॉलर के उत्पादों पर विशेष छूट से वंचित होना पड़ा। इसके अलावा, हाल ही में अमेरिका ने भारत पर पर्यावरण और श्रम संबंधी मानकों को लेकर जुर्माना भी लगाया है, जो ‘दोस्ती’ के उस भाव को झुठलाता है जिसकी नींव ह्यूस्टन में रखी गई थी। सवाल यह उठता है कि क्या अमेरिका कभी वास्तव में भारत का ष्मित्रष् था, या यह केवल एक व्यापारिक साझेदारी थी जो अपने हितों के अनुसार चलती रही? व्यापार और स्वार्थ की राजनीति: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को एक व्यापारिक राष्ट्रपति माना जाता है। उनके लिए हर अंतरराष्ट्रीय संबंध, एक व्यापारिक सौदे से अधिक नहीं था। उन्होंने अपनी पूरी विदेश नीति ।उमतपबं थ्पतेजष् के सिद्धांत पर आधारित की। चाहे वह चीन हो, यूरोप, कनाडा या भारत कृ उन्होंने हर देश के साथ व्यापार घाटे को व्यक्तिगत अपमान की तरह लिया। भारत को भी इससे अछूता नहीं रखा गया। ट्रंप प्रशासन ने न केवल भारत पर टैरिफ बढ़ाया बल्कि फार्मास्यूटिकल, स्टील और टेक्सटाइल जैसे क्षेत्रों में भारत की प्रतिस्पर्धा को चुनौती दी। एक समय जो दोस्ती लग रही थी, वह जल्द ही प्रतिस्पर्धा में बदल गई।
