
नई दिल्ली: भारत और रूस के बीच अंतरिक्ष सहयोग में एक नई संभावनाएं उभर रही हैं। रूस के अंतरिक्ष संगठन रॉस्कोसमोस ने भारत को अपना शक्तिशाली सेमी‑क्रायोजेनिक रॉकेट इंजन RD-191M देने का प्रस्ताव रखा है। साथ ही, इस इंजन को भारत में बनाने की तकनीक हस्तांतरण (Technology Transfer) का विकल्प भी प्रस्तावित किया गया है। यदि यह प्रस्ताव साकार होता है, तो भारत की अंतरिक्ष क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि होने की उम्मीद है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, यह प्रस्ताव रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के हालिया भारत दौरे के दौरान आधिकारिक रूप से सामने आ सकता है। इस इंजन की मदद से भारत के भारी-लिफ्ट रॉकेट LVM3 की क्षमता बढ़ाने की योजना है। वर्तमान में LVM3 का पेलोड लगभग 4 टन है, लेकिन इस इंजन के इस्तेमाल से यह क्षमता 5 से 7 टन तक बढ़ सकती है।
RD-191M इंजन और इसके फायदे
RD-191M एक सेमी‑क्रायोजेनिक इंजन है, जो लिक्विड ऑक्सीजन (LOX) और केरोसीन का इस्तेमाल करता है। इस इंजन की प्रमुख विशेषता यह है कि यह उच्च शक्ति और बेहतर दक्षता प्रदान करता है। इसका इस्तेमाल LVM3 रॉकेट की दूसरी चरण (Second Stage) में किया जाएगा, जिससे रॉकेट की उड़ान स्थिर होगी और भारी उपग्रहों को अंतरिक्ष में ले जाना संभव होगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए एक बड़ी छलांग साबित हो सकता है। इससे न केवल बड़े और भारी उपग्रहों को लॉन्च करना आसान होगा, बल्कि भारत के कमर्शियल लॉन्च मार्केट में भी प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है।
भारत और रूस का अंतरिक्ष सहयोग
भारत ने पहले भी रूस से रॉकेट इंजन खरीदे हैं। इसके उदाहरण हैं क्रायोजेनिक इंजन, जिन्हें भारत ने अपने भू-स्थिर उपग्रहों के लिए इस्तेमाल किया था। हालांकि, पहले इन इंजन की आपूर्ति में अंतरराष्ट्रीय दबाव और अन्य कारणों से बाधाएँ आई थीं। RD-191M इंजन के प्रस्ताव से यह स्थिति बेहतर हो सकती है।
रॉस्कोसमोस के निदेशक दिमित्रि बकानोव ने कहा है कि भारत के साथ यह सहयोग दोनों देशों के लिए लाभकारी होगा। इसके तहत केवल इंजन की आपूर्ति ही नहीं होगी, बल्कि इसे भारत में बनाने की तकनीक भी उपलब्ध कराई जाएगी। इससे भारत भविष्य में अपनी भारी-लिफ्ट रॉकेट परियोजनाओं में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में कदम बढ़ा सकता है।
भविष्य की योजनाएँ और चुनौतियाँ
हालांकि, इस प्रस्ताव को अभी तक आधिकारिक रूप से स्वीकार नहीं किया गया है। इसके लिए तकनीकी परीक्षण और रॉकेट में इंजन को इंटीग्रेट करने की प्रक्रिया की आवश्यकता होगी। इसके अलावा, ISRO खुद भी देशी सेमी‑क्रायोजेनिक इंजन विकसित कर रहा है। इसलिए, रूस से इंजन खरीदने का निर्णय इस देशी परियोजना पर भी प्रभाव डाल सकता है।
विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगर यह सौदा पूरा होता है, तो यह भारत के अंतरिक्ष मिशनों की दिशा बदल सकता है। इसके माध्यम से भारत न केवल बड़े उपग्रहों को लॉन्च करने में सक्षम होगा, बल्कि भविष्य में मानव मिशन और अंतरिक्ष स्टेशन जैसी महत्वाकांक्षी परियोजनाओं में भी तेजी ला सकेगा।
निष्कर्ष
सारांश में कहा जा सकता है कि रूस का RD-191M इंजन भारत के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर है। इससे LVM3 रॉकेट की पेलोड क्षमता बढ़ेगी, अंतरिक्ष में भारत की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ेगी और भारी अंतरिक्ष मिशनों को अंजाम देने की क्षमता भी बढ़ेगी। हालांकि, तकनीकी और राजनीतिक चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए यह देखना होगा कि यह प्रस्ताव कब तक साकार रूप लेता है।
भारत और रूस के इस नए सहयोग से अंतरिक्ष क्षेत्र में दोनों देशों के बीच रणनीतिक संबंध भी मजबूत हो सकते हैं। भविष्य में यह कदम भारत को अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में और अधिक सक्षम और आत्मनिर्भर बनाने में मदद करेगा।
